
यदि मृत्युंजय के संदर्भ में शोक जताने से आत्मा को शांति मिलती तो इस जगत में मरने का कोई प्रचलन नहीं होता, क्यूंकि ईश्वर के हृदय में सारी आत्माओं का संग्रह होता है उस संग्रह को जागृत करने हेतू स्वयं को भगवान सिद्ध करना पड़ता है।


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