वर्ग-साथी में लड़के एवं लड़कियों के बीच अच्छी दोस्ती होनी चाहिए, क्यूंकि इससे उनमें प्रतियोगिता की भावनाएं बढ़ती है।

बच्चों को प्रायोगिक सभ्यताओं से रु-बरु कराना चाहिए, क्यूंकि उन्हें क्रुद्ध करने से उनका मन विचलित होने लगता है।

बच्चों के पुरस्कार की प्रशंसा करनी चाहिए, क्यूंकि इससे उनके मन में उत्साह बढ़ने की क्षमता उत्कृष्ट हो जाता है।

बच्चों को आगे बढ़ने की चेतावनी देनी चाहिए, क्यूंकि कमी सहन करने से उनके दिल में ईर्ष्या की भावना होती है।

बच्चों को प्रशस्त पथ पर अग्रसर करने के लिए भय-मुक्त बनाना चाहिए, क्यूंकि उस पर दबाव डालने से उनके दिल की इच्छा मर जाती है।

बच्चों को पहचान बताने के लिए रिश्तों को समझने की कला सीखाना चाहिए, क्यूंकि उसके शरीर की आत्मा के स्वीकार करने पर उसे सही एवं गलत का अंतर मालूम होगा।

बच्चों को वीर बनाने के लिए उसे सक्रिय बनाना चाहिए, क्यूंकि शरीर के पूरे भाग का अभिक्रिया होने पर उसके फेफड़े का अंकुरण होता है।

बच्चों को प्रत्यक्ष पुण्य से परिचित कराना चाहिए, क्यूंकि उसके शरीर पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा तो उच्च विचार विकसित होगा।

बच्चों को आंतरिक ईजाद से रु-बरु कराना चाहिए, क्यूंकि बाहरी विचार उसके शरीर के भाग के नीचे जाएगा तो वे किसी संरचना का स्वरुप देंगे।

बच्चों को स्कूल स्वच्छ होकर जाना चाहिए, क्यूंकि शरीर का भीतरी भाग ठंडा होगा तो उसे वास्तव में उतारने का मौक़ा मिलेगा।

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